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तीन शक्ति स्तोत्रों में “त्रि-शक्ति त्रिपुटा स्तोत्र” शामिल है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियों के साथ-साथ महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली के समन्वय का वर्णन करता है। अन्य स्तोत्रों में “अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम्” भी है, जो अठारह शक्तिपीठों का आह्वान करता है, तथा “त्रिशक्ति जगदम्बा महामंत्र” है, जो ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ जैसे मंत्रों का एक रूप है।
१. त्रि-शक्ति त्रिपुटा स्तोत्र
यह स्तोत्र ब्रह्मांड की तीन आदि शक्तियों को समर्पित है, जो महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली हैं। इसका मानना है कि उनके समन्वय से जीवन श्रेष्ठ बनता है।
- मंत्र (उदाहरण): ‘सुवर्ण प्रभं ये जपन्ति त्रि शक्ते, श्रियं सौभगत्वं लभन्ते नरास्ते’।
- उद्देश्य: इस स्तोत्र का जाप करने से व्यक्ति को धन, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
२. अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम्
यह स्तोत्र अठारह प्रमुख शक्तिपीठों का उल्लेख करता है, जो योगियों के लिए भी दुर्लभ माने जाते हैं।
- मंत्र (उदाहरण):
- “या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।” (दुर्गा मंत्र)
- शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।
- उद्देश्य: सायंकाल में इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से सभी शत्रुओं का विनाश होता है, सभी रोग दूर होते हैं, और सभी प्रकार की संपत्ति और समृद्धि प्राप्त होती है।
३. त्रिशक्ति जगदम्बा महामंत्र
यह एक शक्तिशाली मंत्र है जिसमें तीन शक्तियों को एकीकृत किया गया है।
- मंत्र: ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा’।
- उद्देश्य: इस मंत्र का उपयोग नकारात्मक ऊर्जा को रोकने और मन को दृढ़ करने के लिए किया जाता है। इसमें देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की शक्तियाँ शामिल हैं।
మూడు శక్తి స్తోత్రాలలో "త్రి-శక్తి త్రిపుట స్తోత్రం" ఉన్నాయి, ఇది బ్రహ్మ, విష్ణు మరియు మహేశ్, అలాగే మహాలక్ష్మి, మహాసరస్వతి మరియు మహాకాళి యొక్క శక్తుల సమన్వయాన్ని వివరిస్తుంది. ఇతర స్తోత్రాలలో "అష్టాదశ శక్తిపీఠ్ స్తోత్రం" ఉన్నాయి. పద్దెనిమిది శక్తి పీఠాలను ఆవాహన చేసే "త్రిశక్తి జగదాంబ మహామంత్రం" మరియు 'ఐం హ్రీం క్లీం చాముండాయే విచ్ఛే' వంటి మంత్రాల వైవిధ్యమైన "త్రిశక్తి జగదాంబ మహామంత్రం" కూడా ఉన్నాయి.
ఈ స్తోత్రం విశ్వంలోని మూడు ప్రధాన శక్తులకు అంకితం చేయబడింది, అవి మహాలక్ష్మి, మహాసరస్వతి మరియు మహాకాళి. వారి సమన్వయం జీవితాన్ని మెరుగుపరుస్తుందని నమ్ముతారు.
మంత్రం (ఉదాహరణ): 'సువర్ణ ప్రభం యే జపంతి త్రి శక్తే, శ్రియం సౌభగత్వం లభంతే నరస్తే'.
ఉద్దేశ్యం: ఈ స్తోత్రాన్ని జపించడం వల్ల సంపద, శ్రేయస్సు మరియు అదృష్టం లభిస్తాయి.
2. అష్టాదశ శక్తిపీఠ స్తోత్రం
ఈ స్తోత్రంలో పద్దెనిమిది ప్రధాన శక్తిపీఠాల గురించి ప్రస్తావించబడింది, ఇవి యోగులకు కూడా అరుదైనవిగా పరిగణించబడతాయి.
మంత్రం (ఉదాహరణ):
"యా దేవి సర్వభూతేషు శక్తి-రూప సంస్థితా. నమస్తేస్యయే నమస్తే నమస్తే నమో నమః." (దుర్గా మంత్రం)
శరణ్యే త్ర్యంబకే గౌరీ నారాయణి నమోస్తుతే.
ఉద్దేశ్యం: సాయంత్రం ఈ స్తోత్రాన్ని ప్రతిరోజూ పఠించడం వల్ల అన్ని శత్రువులు నశిస్తారు, అన్ని వ్యాధులను నయం చేస్తారు మరియు అన్ని రకాల సంపద మరియు శ్రేయస్సును ప్రసాదిస్తారు.
3. త్రిశక్తి జగదంబ మహామంత్రం
ఇది మూడు శక్తులు కలిసి ఉన్న శక్తివంతమైన మంత్రం.
మంత్రం: 'ఐం హ్రీం క్లీం చాముండాయై విచ్చే, జ్వల్ హాం సన్ లాం క్షం ఫట్ స్వాహా'.
ఉద్దేశ్యం: ఈ మంత్రం ప్రతికూల శక్తిని దూరం చేయడానికి మరియు మనస్సును బలోపేతం చేయడానికి ఉపయోగించబడుతుంది. ఇది దుర్గా, లక్ష్మీ మరియు సరస్వతి శక్తులను కలిగి ఉంటుంది.
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शक्ति चेतना मंत्र
माता भगवती दुर्गा जी की साधना का प्रथम क्रम, मुर्झाये जीवनों में जान डाल देने वाला शक्ति चेतना मंत्र :-
(ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः)
माता आदिशक्ति जगत् जननी भगवती दुर्गा जी ने इस ब्रह्माण्ड की रचना अभूतपूर्व ढंग से की है। अनन्त ग्रहों एवं नक्षत्रों की रचना और उनमें संतुलन, आश्चर्य में डाल देने वाला है। मनुष्य जीवन की रचना प्रकृतिसत्ता की शक्ति व कारीगरी का पूर्ण नमूना है। इस विशाल ब्रह्माण्ड की पूर्णता को समेटकर एक छोटे से मनुष्य की काया में भर देने की कारीगरी को देखकर बरबस माता भगवती दुर्गा जी की योगमाया की पूर्णता व विलक्षणता का भान होता है।
हमारे इस शरीर में पूर्ण ब्रह्माण्ड व मूलसत्ता समाहित है। मनुष्य यदि अपने अन्दर की क्षमता को देख सके, पहचान सके और उसका उपयोग कर सके, तो वह पूर्ण प्रकृति से एकाकार हो सकता है, प्रकृतिमय बन सकता है। यह क्षमता केवल मनुष्य में ही समाहित है, अन्य जीवों में नहीं। हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने अपने अन्दर की क्षमता को अनेकों माध्यमों का उपयोग करके देखा, पहचाना है व जाग्रत् किया है। वर्तमान में मनुष्य जिस स्थिति में है, वैसा पहले नहीं था। सृष्टि के निर्माण के समय मनुष्य पूर्ण जाग्रत् था, हर पल प्रकृति से एकाकार था। मगर, समय के साथ उसके भोगवादी स्वभाव ने उसके ही कर्मों से उसकी चेतना में कुकर्मों के इतने आवरण चढ़ा दिये कि उसकी मूल चेतना गहराई में डूब गई, जबकि सब कुछ उसके शरीर में आज भी उसी प्रकार है, जैसे पहले था। मगर, अब उस पर आवरण की अनेक परतें छा चुकी हैं। जिस प्रकार यदि प्रकाश दे रहे विद्युत् बल्ब के ऊपर मिट्टी का आवरण चढ़ जाये, तो फिर वह बल्ब अन्दर तो उसी प्रकार जलता रहेगा, लेकिन बाहर प्रकाश नहीं फेंक सकेगा। उसी प्रकार मनुष्य के अन्दर आज भी प्रकृति से एकाकार होने की पूर्ण क्षमता मौजूद है, मगर आवरणों को हटाने की आवश्यकता है और इन कुकर्मों के आवरणों को सत्कर्मों के माध्यम से ही हटाया जा सकता है। आज उन जाग्रत् चैतन्य ऋषि-मुनियों के बताये मार्ग्रों, सत्कर्मों एवं क्रियाओं को अपनाना होगा।
हमारे अग्रज ऋषि-मुनियों ने हमें अनेक मार्ग व क्रियायें बताई हैं, जैसे शुद्धता रखना, सात्त्विक भोजन करना, व्रत रखना और योग आदि। उसी क्रम में उन्होंने महत्त्वपूर्ण क्रम प्रदान किया है, मंत्रों का जाप। मंत्र का एक-एक अक्षर प्रकृति व मनुष्य की ग्रंथियों से एकाकार है। प्रकृति में उच्चारित हर शब्द मंत्रमय है। हर शब्द का हमारे शरीर पर किसी न किसी रूप में प्रभाव पड़ता ही है। उन्हीं शब्दों का चयन करके हमारे ऋषियों-मुनियां ने प्रत्येक क्षेत्र का कार्य करने, अपने शरीर पर प्रभाव डालने तथा जड़ चेतना को जाग्रत करने के लिए अलग-अलग मंत्रों की रचना की है। उन्हीं मंत्रों में एक है यह अति विशिष्ट मंत्र ‘‘ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः।‘‘
वर्तमान कलियुगी वातावरण से पर्यावरण प्रदूषित हो चुका है। मनुष्यों की सम्पूर्ण शारीरिक चेतना जड़ पड़ चुकी है और वह शक्तिहीन बन गया है। इस समय केवल यही उपर्युक्त मंत्र मनुष्य को चेतनावान् बना सकता है और प्रकृति से एकाकार करने वाली ग्रंथियों की जड़ता दूर कर सकता है। अगर आप अपनी जड़ता को इस मंत्र के माध्यम से दूर करने में सफल हो जाते हैं, तो आगे का आपका मार्ग या कोई भी आध्यात्मिक क्रियायें व मंत्रजप फलप्रद होने लगेंगे।
इस मंत्र की विशेषताएं :
1.यह मंत्र माता आदिशक्ति जगत् जननी भगवती दुर्गा जी का पूर्ण चेतना मंत्र है।
2.यह पूर्ण उत्कीलित है। कोई भी व्यक्ति इसका जाप कर सकता है।
3.इसका जाप शुद्धता-अशुद्धता, किसी भी स्थिति में मानसिक रूप से किया जा सकता है।
4.यह मंत्र माता भगवती दुर्गा जी की प्रीति व कृपा प्राप्त करने में पूर्ण सहायक है।
5.इसका जाप एक आसन में बैठकर शुद्धता से करने पर कई गुना फल प्राप्त होता है।
6.इसका सवा लाख जप कर लेने पर इसकी ऊर्जा पूर्णता से कार्य करने लगती है।
7.इस मंत्र के 24 लाख जप करने वाले के शरीर की शक्ति (चेतना) जाग्रत् होने लगती है। अनेकों अनुभूतियों का एहसास होने के साथ ही माता भगवती की पूर्ण प्रीति व कृपा प्राप्त होती है। उसके अनेकों रुके कार्य स्वाभाविक गति से सम्पन्न होने लगते हैं।
8.इस मंत्र के 24 लाख के 24 अनुष्ठान पूर्ण करने पर यह पूर्ण सिद्ध हो जाता है। फिर किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए यदि मंत्र का जाप करके कामना की जाए, तो वह पूर्ण होता है। कई बार माता के दर्शन की झलकियां भी प्राप्त हो जाती हैं। मनुष्य के अन्दर देवत्व का उदय होने लगता है तथा उसकी पूर्ण कुण्डलनी चेतना में स्पन्दन होने लगता है। उसके बाद मनुष्य इस मंत्र का जितना जाप करता जाता है, उसकी चेतना उतनी ही जाग्रत् होती चली जाती है और वह प्रकृति की उतनी ही नजदीकता महसूस करता चला जाता है। उसकी कुण्डलिनी जाग्रत् होती चली जाती है और अनुभूतियां बढ़ती जाती हैं।
आगे गुरु मार्ग पर चलना हितकर होता है, अन्यथा शक्ति के प्रवाह का भटकाव भी आ जाता है। इसी मंत्र के अन्त में ‘‘स्वाहा‘‘ शब्द लगाकर पवित्र अग्नि में हवन भी किया जा सकता है। हवन बाजार में उपलब्ध होने वाली हवन सामग्री से या किसी भी निर्मित पवित्र हवन सामग्री से स्वयं किया जा सकता है।
मंत्र जाप करने पर हवन करना जरूरी नहीं है। मगर यदि हवन भी कुछ कर लिया जाता है, तो और भी अच्छा है। वैसे तो मंत्र जप में दशांश हवन करने का विधान है, मगर जो किया जा सके, उतना ही पर्याप्त है।
मंत्र जाप करते समय माता भगवती दुर्गा जी के किसी भी ममतामयी स्वरूप का चिंतन किया जा सकता है तथा माँ की किसी भी छवि या मूर्ति का पूजन किया जा सकता है। इस मंत्र का जाप स्त्री, पुरुष, बच्चे व बूढ़े सभी कर सकते हैं। वैसे तो मंत्र जाप जितना ज्यादा हो सके, करते रहना चाहिए। नित्य निर्धारित मंत्र जप करने की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। मंत्र जाप माला के द्वारा या बिना माला के भी किया जा सकता है। दोनों का फल बराबर है। निर्धारित मंत्र जाप के लिए माला का उपयोग कर सकते हैं। जाप रुद्राक्ष, तुलसी, स्फटिक, मूंगा, कमलगट्टे या अकीक की माला से कर सकते हैं। जाप करने वाले को सात्त्विक आहार करना चाहिए। मांस-मदिरा या अन्य नशों के सेवन करने वाले को मंत्र जाप का पूर्ण फल नहीं प्राप्त हो पाता है।
यदि अनुष्ठान लगातार पूरे समय सम्पन्न करने का क्रम चल रहा हो, तब ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना आवश्यक है, सामान्य नित्य के जाप में आवश्यक नहीं। मगर, सन्तुलित जीवन व अच्छे आचरण का पालन करना फलप्रद होता है।
इस मंत्र के जाप से अब तक समाज के लाखों लोगों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन प्राप्त किया है तथा अनेकों संकटों से मुक्ति प्राप्त की है। अनेक भक्तों ने तो इसके माध्यम से महाशक्तियज्ञों में माता भगवती दुर्गा जी की झलकियां प्राप्त की हैं और अनेकों प्रकार की अनुभूतियों को प्राप्त किया है। इस मंत्र जाप के प्रभाव से अनेकों लोगों ने अपने अवगुणों एवं गलत आचरणों से मुक्ति प्राप्त की है। इस मंत्र का सदैव जाप करने वाले के जीवन में आने वाले विघ्नों का हरण होता है। मनुष्य सदैव माता की कृपा का एहसास करता रहता है।
जय माता की - जय गुरुवर की
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नित्य साधना क्रम
नित्य साधना क्रम
सर्वप्रथम, स्नान के उपरान्त स्वच्छ धुले कपडे़ धारण करके अपने पूजन स्थल में स्थापित शक्तियों को प्रणाम करते हुए आसन पर बैठें। सामने गुरु एवं “माँ” तथा अन्य सभी सहायक शक्तियों की छवियों को साफ धुले हुए गीले कपडे़ से (स्नान कराने का भाव लेते हुए) पोंछकर साफ करें एवं कुंकुम का तिलक लगायें तथा पुष्प समर्पित करके अगरबत्ती या धूप और दीप प्रज्जवलित करें। तत्पश्चात्, नीचे दिये हुए प्रत्येक मंत्र का तीन-तीन बार तथा गुरुमंत्र एवं “माँ” के चेतनामंत्र का पाँच-पाँच बार उच्चारण करें:
1- माँ
2- ॐ
3- सोऽहं
4- ॐ हं हनुमतये नमः
5- ॐ भ्रं भैरवाय नमः
6- ॐ गं गणपतये नमः
7- ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नमः
8- ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः
मंत्रोच्चारण क्रम पूर्ण करने के पश्चात्, सर्वप्रथम श्री शक्तिपुत्र जी गुरुचालीसा का पाठ करें। तत्पश्चात्, श्री दुर्गाचालीसा का पाठ पूर्ण करें ।
श्री शक्तिपुत्र जी गुरुचालीसा
दोहा- प्रणवहुँ गुरुवर के चरण, श्री शक्तिपुत्र महाराज ।
शरण चरण में दीजिये, सफल होयं सब काज ।।
जय हो शक्तिपुत्र वरदानी । कृपा करो मोहे बालक जानी ।।
‘माँ’ की मधुमय ममता तुम हो । दुःखहर्ता इस जग के तुम हो ।।
मात-पिता प्रिय बंधु तुम हो । मेरी धन-सम्पत्ति भी तुम हो ।।
जग में छाया था अंधियारा । दिखता था ना कोइ सहारा ।।
धर्म बना था एक छलावा । तंत्र-मंत्र था एक भुलावा ।।
माया मोह सकल तन छाया । भूले अपना और पराया ।।
तुमने सच्ची राह दिखाई । भवसागर में नाव बताई ।।
तुम हो जगदम्बे के प्यारे । दुर्गे माँ का योग दुलारे ।।
युग में नई चेतना लाये । तुमने ‘माँ’ के दर्शन पाये ।।
‘माँ’ है प्रथम शब्द प्रकृति का । यही नाम नाशक विकृति का ।।
माँ अम्बे की शक्ति पा ली । भक्ति की नयी राह निकाली ।।
योग तपस्या के अनुसारी । देखें सकल दु:खित नर-नारी ।।
शतअष्ठी यज्ञ का प्रण ठाना । जासे क्षार होय दु:ख नाना ।।
जनकल्याण होय सुखकारी । तुम निर्बल-निर्धन हितकारी ।।
याचक दु:खिया जो कोई आवे । अपने मन की आशा पावे ।।
रोग-शोक-भय निर्धनताई । दूर रहे हमसे कठिनाई ।।
हमको दीजै प्रभु धन-धाना । यश-बल दीजै औ सुख नाना ।।
देना हमको मान सुहाना । निज बल से बलवान् बनाना ।।
अंधकार में दिया बता दो । माँ दुर्गे की दया दिला दो ।।
तुम्हें छोड़ युग के निर्माता । कहाँ झुकायें अपना माथा ।।
तुम ही गुरु परम श्रद्धेया । नित नव बरसाओ स्नेहा ।।
बैठे हम झोली फैलाये । तुम बिन ज्ञान कहाँ से पायें ।।
होय असंभव संभव कर दे । शक्ति-भक्ति का हमको वर दे ।।
सुना गुरु जगदम्ब मिलाते । दर्शन की हम आस लगाते ।।
दु:खिया मन की डोर संभारो । भवसागर से हमें उबारो ।।
हरा-भरा यह घर हो सारा । गूँजे इसमें नाम तुम्हारा ।।
रात-दिना हम बढ़ते जायें । धन यश कीरत सुख मुस्कायें ।।
शक्तिजल आशीष तुम्हारा । रोग-शोक का मेटनहारा ।।
तन-मन के हर रोग नसावे । श्रद्धामय जो कोई पावे ।।
गुरुवार प्रिय दिवस तुम्हारा । रहे व्रती नासै कलि भारा ।।
हमको अपनी राह चलाना । करुणामय निज रूप दिखाना ।।
जब हम भय संकट में आवें । ध्यान आपका हमें बचावे ।।
प्रेम तेरा हो मन में अपने । देखें बस तेरे ही सपने ।।
राह से तेरी हट न जायें । चाहे कष्ट हजारों आयें ।।
अंत समय जब आए हमारा । अधरों पर हो नाम तुम्हारा ।।
जब यह छूटे जग की काया । मिले जगत् जननी की छाया ।।
श्री शक्तिपुत्र चालीसा गावे । दु:ख-भय-शोक निकट नहिं आवे।।
यह सत बार पाठ कर जोई । दया गुरु संग “माँ” की होई ।।
यह है शिष्य निपट अज्ञानी । करहु कृपा गुरु संग भवानी ।।
मन मूरख है शरण में लीजै । अपनी भक्ति शक्ति कुछ दीजै ।।
दोहा- भीतर बाहर सब जगह, तेरा ही विस्तार ।
नाम तेरा ही गूँजता, युग चेतन करतार ।।
श्री दुर्गाचालीसा
नमो नमो दुर्गे सुखकरनी । नमो नमो अम्बे दु:खहरनी।।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहुं लोक फैली उजियारी ।।
शशि ललाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।।
रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ।।
तुम संसार शक्तिलय कीन्हां । पालन हेतु अन्न-धन दीन्हां ।।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।।
प्रलयकाल सब नाशनहारी । तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ।।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा-विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।।
रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा ।।
धरा रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भई फाड़कर खम्भा ।।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो । हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ।।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं । श्री नारायण अंग समाहीं ।।
क्षीर सिंधु में करत विलासा । दयासिंधु दीजै मन आसा ।।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ।।
मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ।।
श्री भैरव तारा जगतारिणी । छिन्न भाल भव दुःखनिवारिणी ।।
केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ।।
कर में खप्पर खड्ग विराजै । जाको देख काल डर भाजै ।।
सोहै अस्त्र और त्रियशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ।।
नगरकोट में तुम्हीं विराजत । तिहुं लोक में डंका बाजत।।
शुम्भ-निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ।।
महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ।।
रूप कराल काली को धारा । सेन सहित तुम तेहि संहारा ।।
परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब । भई सहाय मातु तुम तब-तब ।।
अमरपुरी औरों सब लोका । तव महिमा सब रहें अशोका ।।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ।।
प्रेम भक्ति से जो नर गावै । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै ।।
ध्यावै तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म-मरण ताको छुटि जाई ।।
योगी-सुर-मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ।।
शंकर आचारज तप कीन्हों । काम-क्रोध जीति सब लीन्हों ।।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ।।
शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछितायो ।।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ।।
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन्ह विलम्बा ।।
मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ।।
आशा तृष्णा निपट सतावें । मोह-मदादिक सब विनसावें ।।
शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरहुँ एकचित तुम्हें भवानी ।।
करहु कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ।।
जब लग जियौं दयाफल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ।।
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै । सब सुख भोग परम पद पावै ।।
देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।। करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।।
श्री दुर्गाचालीसा पाठ क्रम को पूर्ण करने के पश्चात्, निम्नलिखित श्लोकों का क्रमशः उच्चारण करें-
श्लोक
ॐ गजाननं भूतगणाधिसेवितं, कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम् ।
उमासुतं शोक विनाशकारकं, नमामि विघ्नेश्वर पाद्पंकजम् ।।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः ।।
या देवी सर्वभूतेषु, मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ।।
अब, दोनों हाथों में आरती थाल लेकर पूर्ण एकाग्रता से प्रत्येक पंक्ति पर ध्यान देते हुए श्री सद्गुरुदेव जी की आरती एवं माता भगवती जगज्जननी जगदम्बा जी की आरती, अपने आसन में ही बैठकर पूर्ण करें।
आरती श्री सद्गुरुदेव जी की
जय गुरुदेव दयानिधि, दीनन हितकारी ।
जय जय मोहविनाशक, भव बंधनहारी ।। ॐ जय …
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, गुरु मूरत धारी ।
वेद पुराण बखानत, गुरु महिमा भारी ।। ॐ जय …
जप तप तीरथ संयम, दान विविध कीजै ।
गुरु बिन ज्ञान न होवे, कोटि यतन कीजै ।। ॐ जय …
माया मोह नदी जल, जीव बहें सारे ।
नाम जहाज बैठाकर, गुरु पल में तारे ।। ॐ जय …
काम क्रोध मद मत्सर, चोर बडे़ भारी ।
ज्ञान खड्ग दे कर में, गुरु सब संहारे ।। ॐ जय …
नाना पंथ जगत् में, निज निज गुण गायें ।
सबका सार बताकर, गुरु मारग लायें ।। ॐ जय …
गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातकहारी ।
वचन सुनत श्री गुरु के, सब संशयहारी ।। ॐ जय …
तन मन धन सब अर्पण, गुरु चरणन कीजै ।
ब्रह्मानन्द परमपद, मोक्ष गती लीजै ।। ॐ जय …
आरती श्री माता जी की
जगजननी जय जय, माँ जगजननी जय जय ।
भयहारिणि, भवतारिणि, भवभामिनि जय जय ।।
तू ही सत-चित-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा ।
सत्य सनातन सुन्दर, पर-शिव-सुर-भूपा ।। माँ जग …
आदि अनादि अनामय, अविचल अविनाशी ।
अमल अनन्त अगोचर, अज आनंदराशी ।। माँ जग …
अविकारी अघहारी, अकल कलाधारी ।
कर्ता विधि भर्ता हरि, हर संहारकारी ।। माँ जग …
तू विधि वधू रमा तू, उमा महामाया ।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी जाया ।। माँ जग …
राम-कृष्ण तू सीता, ब्रजरानी राधा ।
तू वाञ्छाकल्पद्रुम, हारिणी सब बाधा ।। माँ जग …
दस विद्या नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा ।
अष्टमातृका योगिनि, नव-नव रूप धरा ।। माँ जग …
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू ।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू ।। माँ जग …
सुर-मुनि-मोहिनी सौम्या, तू शोभाधारा ।
विवसन विकट स्वरूपा, प्रलयमयी धारा ।। माँ जग …
तू ही स्नेह सुधामयि, तू अति गरलमना ।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थितना ।। माँ जग …
मूलाधार निवासिनि, इह-पर-सिद्धप्रदे ।
कालातीता काली, कमला तू वरदे ।। माँ जग …
शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी ।
भेदप्रदर्शनि वाणी, विमले! वेदत्रयी ।। माँ जग …
हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे ।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे ।। माँ जग …
निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै ।
करुणा कर करुणामयि, चरण-शरण दीजै ।। माँ जग …
जगजननी जय जय, माँ! जगजननी जय जय ।
भयहारिणि भवतारिणि, भवभामिनि जय जय ।।
आरती का क्रम पूर्ण होने के पश्चात्, ज्योति (दीपक या आरती थाल) के चारों ओर जल छिड़ककर आचमन समर्पित करें । तत्पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर (इस समस्त पूजन क्रम में यदि कोई त्रुटि हो गई हो, तो यही भाव लेते हुए) ‘माँ’ एवं गुरुवर की छवि के समक्ष निम्न श्लोक के माध्यम से क्षमायाचना करते हुए समर्पण स्तुति सम्पन्न करें –
क्षमायाचना
या देवी सर्वभूतेषु क्षमारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ।।
समर्पण स्तुति
अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में ।
है जीत तुम्हारे हाथों में, और हार तुम्हारे हाथों में ।। अब …
मेरा निश्चय है बस एक यही, एक बार तुम्हें पा जाऊं मैं ।
अर्पण कर दूं दुनियाभर का, सब प्यार तुम्हारे हाथों में ।। अब …
जो जग में रहूं तो ऐसे रहूं, ज्यों जल में कमल का फूल रहे ।
मेरे सब गुण-दोष समर्पित हों, भगवती तुम्हारे चरणों में ।। अब …
यदि मानव का मुझे जन्म मिले, तो तव चरणों का पुजारी बनूं ।
इस पूजक की इक-इक रग का, हो तार तुम्हारे हाथों में ।। अब …
जब जब संसार का कैदी बनूं, निष्काम भाव से कर्म करूं ।
फिर अंत समय में प्राण तजूं, साकार तुम्हारे हाथों में ।। अब …
मुझमें तुझमें बस भेद यही, मैं नर हूँ तुम नारायणि हो ।
मैं हूं संसार के हाथों में, संसार तुम्हारे हाथों में ।। अब …
समर्पण स्तुति पूर्ण करने के पश्चात्, निम्न जयघोष करें –
परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की- जय !
माता आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बे मातु की- जय !
पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की- जय !
इसके उपरान्त, पाँच-पाँच बार ‘माँ’ एवं ‘ॐ’ का क्रमिक उच्चारण (अर्थात् एक बार ‘माँ’ फिर एक बार ‘ॐ’ का) का उच्चारण पूर्ण करें ।
ध्यान क्रम- उच्चारण पूर्ण करने के पश्चात्, दो मिनट के लिये अपने नेत्रों को बन्द कर दोनों भौहों के मध्य स्थिति आज्ञाचक्र पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करते हैं । ध्यानक्रम के समय हमें माता भगवती की ममतामयी छवि या परम पूज्य सद्गुरुदेव जी की छवि को अपने अन्तःकरण में स्थापित करने का प्रयास करना चाहिये या फिर पावन धाम ‘पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम’ का ध्यान किया जाना चाहिये और धीरे-धीरे मन को पूर्णतः विचारशून्यता की स्थिति में लाने का प्रयास करना चाहिए।
नोट- सामान्यतः ध्यान के क्रम के लिये प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम पंद्रह मिनट का समय देना हितकारी सिद्ध होगा। यह क्रम आरती के समय से अलग भी कभी किसी अवस्था में बैठे हुए, लेटकर या रात्रि विश्राम में जाने से पूर्व किया जा सकता है।
ध्यानक्रम पूर्ण करने के पश्चात्, पांच-पांच बार क्रमशः गुरुमंत्र ‘ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नमः’ एवं माँ के चेतनामंत्र ‘ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः’ का उच्चारण करें, जिससे सम्पन्न किये गये इस सम्पूर्ण क्रम की ऊर्जा को अपने अन्दर समाहित कर सकें।
तत्पश्चात् निम्नलिखित जयघोषों को पूर्ण करें –
धर्मसम्राट युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की– जय!
माता भगवती आदिशक्ति जगज्जननी जगदम्बे मातु की– जय !
पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की– जय !
हनुमत देव की – जय !
भैरव देव की – जय !
गणपति देव की – जय !
गौमाता की- जय!
गंगा मैया की – जय!
सच्चे दरबार की – जय !
धर्म की – जय हो !
अधर्म का – नाश हो !
प्राणियों में – सद्भावना हो !
विश्व का – कल्याण हो !
जन-जन में – ‘माँ’ की चेतना हो !
भगवती मानव कल्याण संगठन – सत्यधर्म का रक्षक है।
सच्चे दरबार की – जय !
नित्य साधना क्रम के अन्त में शान्ति पाठ करें –
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
आरतीक्रम को सम्पन्न करने के पश्चात् मंच पर स्थापित समस्त शक्तियों को पूर्ण नमन भाव से प्रणाम करते हुए तीन बार शंखध्वनि करें।
विशेष नोट- यह सम्पूर्ण नित्य साधनाक्रम परम पूज्य सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के द्वारा निर्देशित है। पूर्ण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त एवं चरित्रवान जीवन जीते हुए यदि यह क्रम श्री गुरुदेव जी तथा माता भगवती के चरणों में पूर्ण विश्वास एवं श्रद्धा भाव रखकर नित्यप्रति सम्पन्न किया जाये तथा अपने जीवन की विषमताओं एवं न्यूनताओं को दूर करने का सतत प्रयास किया जाये, तो सर्वथा हितकारी एवं पूर्ण लाभप्रद सिद्ध होगा तथा किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति में पूर्ण सहायक होगा। यदि किसी के पास बहुत अधिक समय का अभाव हो, तो पूज्य सद्गुरुदेव जी का गुरुमंत्र ‘ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नमः’ एवं ‘माँ’ के विशिष्ट चेतना मंत्र ‘ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः’ का किसी भी समय एवं किसी भी अवस्था में जाप करते रहना चाहिये। और, यदि आपके पास पर्याप्त समय हो, तो किसी आसन पर बैठकर मंत्रो का जाप किसी माला से कम से कम एक माला या जितनी बार सम्भव हो, करें या बगैर माला के भी जाप किया जा सकता है।
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त्रिशक्ति जगदम्बा महामंत्र
त्रिशक्ति जगदम्बा सर्वार्थ सिद्धि महामंत्र
श्री त्रिशक्ति चेतना मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै,
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै, ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।
-परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज
माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क्रम में, विश्व अध्यात्म जगत् का यह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण महामंत्र है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की सभी शक्तियों के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किये जा सकते हैं। यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि सात मंत्रों-स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। यह माता भगवती दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है।
उपर्युक्त मंत्र के विषय में समाज ने आज तक पढ़ा होगा, सुना होगा या कुछ लोगों के द्वारा जाप भी किया गया होगा। मगर, आज तक इस मंत्र की जाप-साधना का क्रम व विधान पूर्णतया गोपनीय रहा है। विश्व आध्यात्मिक जगत् मेें हलचल मचा देने वाले इस मंत्र के विषय में विस्तार से विवरण या साधना विधि किसी पुस्तक में उपलब्ध नहीं है। दुर्गा सप्तशती व कुछ अन्य पुस्तकों में इस मंत्र के विषय में संक्षिप्त सी जानकारी दी गई है।
इस मंत्र को नवार्ण मन्त्र से भी संबोधित करते हैं। इसकी ऊर्जा से जीवन की सभी समस्याओं का निदान प्राप्त किया जा सकता है, पूर्ण चेतनावान् बना जा सकता है एवं पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
इस त्रिशक्ति जगदम्बा सर्वार्थ सिद्धि मंत्र की साधना विधि की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए बड़े-बड़े योगी, साधु-सन्त, संन्यासी प्रयासरत हैं। इसका पूर्ण विधि-विधान व इसके फल का वर्णन करना सदैव वर्जित रहता है। किन्तु, मैं समाजकल्याण को ध्यान में रखकर माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी के आशीर्वाद से व उनकी इच्छानुसार इस महामंत्र के प्रथम चरण की सभी महत्त्वपूर्ण जानकारियां समाज को पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदान कर रहा हूँ। माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की ममतामयी कृपा व आशीर्वाद से मैंने इस त्रिशक्ति जगदम्बा सर्वार्थ सिद्धि मंत्र के माध्यम से पूर्णता प्राप्त की है। यह मंत्र मेरे पूर्व जन्मों के साधनाक्रमों का एक अंग रहा है। इसकी पूर्णता मैंने आज तक केवल अपनी एक शिष्या (सिद्धाश्रम प्राप्त) ‘‘योगिनी त्रिशक्ति महामाया‘‘ को ही प्रदान की है। वर्तमान समाज भी क्रमिक रूप से इसके क्रमों को पूर्ण करके इसकी पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
इस महामंत्र के प्रथम चरण की पूर्णता के लिए सभी महत्त्वपूर्ण प्रारम्भिक जानकारियों का होना नितान्त आवश्यक है। मैंनेे इस मंत्र से मारण, मोहन, वशीकरण आदि कर्म पूर्ण होना लिखा है, मगर समाज मारण, मोहन व वशीकरण आदि को प्रायः नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक रूप में प्रयोग करना समझता है। इन्हें किस रूप में लेना चाहिए, यह स्पष्ट करना अत्यन्त आवश्यक है। अतः उपर्युक्त महामंत्र के जाप फल में भाव निम्नानुसार ही होना चाहिए:
इस त्रिशक्ति जगदम्बा सर्वार्थ सिद्धि मंत्र में एक ऐसी अलौकिक ऊर्जा समाहित है, जिसकी तुलना किसी अन्य मंत्र से नहीं की जा सकती। इसमें हजारों गायत्री मंत्रों की ऊर्जा समाहित है। यह मंत्र मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन तथा उच्चाटन आदि के क्षेत्र में पूर्ण प्रभावक है और सभी कालकुचक्रों का नाशक है।
1. मारण- मारण का भाव है अपने क्रोध, मद, लोभ आदि का नाश, न कि किसी की हत्या का चिंतन करना। इससे शत्रुओं को पराजित करने का भाव लिया जा सकता है। इस मंत्र के जाप से शत्रुपक्ष की शक्ति क्षीण हो जाती है। प्रकृति स्वतः दण्डित करती है। साधक को केवल इस मंत्र की ऊर्जा ग्रहण करते रहना चाहिए।
2. मोहन- मोहन का तात्पर्य है अपनी इष्ट माता भगवती जी को प्रसन्न करना। यदि वह साधक पर प्रसन्न हो गयीं, तो फिर प्रकृतिसत्ता उसकी इच्छानुसार समाज के हर क्षेत्र में साधक के प्रति सम वातावरण तैयार करती रहती हैं।
3. वशीकरण- इस मंत्र की ऊर्जा से अपने मन को पूर्णतया अपने वश में किया जा सकता है और जिसका अपने मन पर अधिकार हो जाता है, वह स्वतः सबके मन पर अधिकार करने की पात्रता प्राप्त कर लेता है।
4. स्तम्भन- इस मंत्र के माध्यम से अपनी इन्द्रियों को विषय-विकारों से रोका जा सकता है या स्तम्भित किया जा सकता है। जो व्यक्ति अपने विषय-विकारों को रोकने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, वह हर क्षेत्र में स्तम्भन कर सकता है।
5. उच्चाटन- इस मंत्र के द्वारा मोह, ममता, लिप्तता आदि को त्यागकर साधक मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहता है और जिसने स्वयं को भौतिक जगत् से उच्चाटित करके आध्यात्मिक जगत् से नाता जोड़ लिया, तो फिर वह किसी भी क्षेत्र की स्थिति का उच्चाटन कर सकता है।
इस महामंत्र के जप में उपर्युक्त भाव साधक के प्रथम चरण की पात्रता प्राप्त करने तक ही रहना चाहिये। उससे आगे के भाव क्षेत्र में अन्य लाभ लेने के लिये इस महामंत्र का लाभ, पूर्ण पात्रताप्राप्त सद्गुरु के मार्गदर्शन में ही प्राप्त किया जा सकता है।
इस त्रिशक्ति जगदम्बा सर्वार्थ सिद्धि मंत्र का प्रभाव साधकों के लिए पारसमणि के समान कार्य करता है। साधक जितना ही इस मंत्र की ऊर्जा से एकाकार करता जाता है, उतना ही वह प्रकृतिसत्ता से एकाकार होता जाता है। इस मंत्र का उपयोग करके साधक अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त कर सकता है। नियमानुसार, समाज के गृहस्थ लोग कुछ मंत्रों का जाप करके पर्याप्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं और अगर चाह लें, तो पूर्ण मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं।
सर्वार्थ सिद्धि महामंत्र की विशेषताएं
1. यह महामंत्र माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी सहित उनके तीनों स्वरूपों महासरस्वती, महालक्ष्मी व महाकाली को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद व दर्शन प्राप्त करने का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है।
2. शक्ति साधना के महत्त्वपूर्ण मंत्रों-स्तोत्रों में इस महामंत्र का प्रमुख स्थान है।
3. इसकी पूर्णता प्राप्त करके जीवन में सम्पूर्ण पूर्णता (मोक्ष) प्राप्त की जा सकती है।
4. इसके माध्यम से मनुष्य अपनी कुण्डलिनी चेतना को जाग्रत् कर सकता है।
5. इस महामंत्र का जाप स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े कोई भी कर सकते हैं।
6. इसका जाप माला के द्वारा या बिना माला के भी किया जा सकता है, दोनों का फल बराबर है।
7. इसका जाप रुद्राक्ष, स्फटिक, मूंगा, कमलगट्टे, हकीक या मोती की माला से किया जा सकता है। मगर रुद्राक्ष व स्फटिक मिश्रित माला से जाप करना ज्यादा उपयुक्त होता है या कमलगट्टे, स्फटिक व मूंगे की बनी माला भी प्रभावक होती है।
8. जिस माला से इस महामंत्र का सवा लाख से अधिक जाप किया गया हो, उसे गले में धारण करके और अनेकों लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं, क्योंकि जिस माला से जाप किया जाता है, वह धीरे-धीरे स्वतः ऊर्जावान् हो जाती है, जिसका लाभ धारण करके ही अनुभव किया जा सकता है।
9. इस महामंत्र का प्रथम पुरश्चरण सवा लाख का, मंत्र जाप कर लेने पर तथा आगे जाप करते रहने पर मंत्र का लाभ मिलना प्रारम्भ हो जाता है।
इसका दूसरा पुरश्चरण चौबीस लाख मंत्र जाप करने पर पूर्ण होता है। इसे पूर्ण करने पर साधक को अनेकों अनुभूतियाँ मिलने लगती हैं। इस मंत्र पर प्रथम चरण का अधिकार प्राप्त हो जाता है और उसके अनेकों रुके कार्य अपनी स्वाभाविक गति से पूर्ण होने लगते हैं। साधक की आंतरिक चेतना जाग्रत् होने लगती है और उसे सूक्ष्म व स्वप्नों के माध्यम से माता भगवती व तीनों महादेवियों के दर्शन व आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
चौबीस लाख के 24 अनुष्ठान पूर्ण करने पर यह महामंत्र सिद्ध हो जाता है, जिसे प्रथम चरण की सम्पूर्ण पूर्णता कहा जाता है। तदुपरान्त, साधक इस मंत्र के जप का उपयोग करके अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकता है। साधक के अन्दर अलौकिक तेज जाग्रत् हो जाता है। उसकी कुण्डलिनी चेतना जाग्रत् हो उठती है और उसे प्रकृति से एकाकार करने का मार्ग मिल जाता है। साधक के अन्दर देवत्व का उदय होता है। उसके आगे वह इस महामंत्र को जितना भी जाप करता जाता है, उसे उतनी ही सफलता मिलती जाती है। उसका बहुमुखी विकास होता है, प्रकृति की नजदीकता प्राप्त होती है और प्रकृति के रहस्य मिलने लगते हैं। सत्य-असत्य का ज्ञान होता है, किन्तु आगे गुरु मार्गदर्शन प्राप्त करना आवश्यक होता है, जिससे ऊर्जा का सदुपयोग हो, दुरुपयोग न हो सके।
महामंत्र का जाप करते समय माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी के किसी भी स्वरूप का चिन्तन-पूजन किया जा सकता है। साथ ही माता सरस्वती, माता लक्ष्मी व माता काली के स्वरूपों का चिंतन भी किया जा सकता है व उनकी छवि का पूजन किया जा सकता है।
इस महामंत्र का जाप करके शत्रुओं पर पूर्ण विजय प्राप्त की जा सकती है।
इसका 24 लाख जप पूर्ण करने पर वाक्सिद्धि प्राप्त होती है, मगर यदि दुरुपयोग किया गया, तो वाक्सिद्धि स्वतः नष्ट हो जाती है।
इस महामंत्र का 24 लाख जाप पूर्ण होने पर साधक की आवश्यकतानुसार आर्थिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।
किसी समस्या के निदान के लिए यदि पूर्ण लगन से सवा लाख मंत्र का जाप, अनुष्ठान के रूप में किया जाय, तो तत्काल सफलता प्राप्त होती है।
इसका प्रतिदिन 108 बार जाप किया जाय, तो माता भगवती की कृपा बनी रहती है।
यह महामंत्र मनुष्य को पूर्ण भौतिक व आध्यात्मिक सफलता प्रदान करने वाला है।
इस महामंत्र के 24 लाख जप के 24 अनुष्ठान पूर्ण करने वाला साधक समाज के किसी भी व्यक्ति की समस्या के निदान के लिए खुद एक निर्धारित जप करके लाभ दे सकता है, अर्थात् उसे दूसरे की समस्या निदान करने की पात्रता भी प्राप्त हो जाती है। इस महामंत्र का विस्तृत प्रयोग क्रम, महामंत्र की सभी पद्धतियों से पूर्णता प्राप्त सद्गुरु के मार्गदर्शन में प्राप्त किया जा सकता है।
इसका जाप करने वाला साधक सभी प्रकार के भय से मुक्ति प्राप्त कर लेता है तथा शत्रुओं के बीच, घनघोर जंगल में हिंसक जानवरों के बीच या श्मशान में भी निर्भय घूम सकता है।
महामंत्र जाप के आवश्यक नियम
त्रिशक्ति जगदम्बा सर्वार्थ सिद्धि महामंत्र का पूर्ण फल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब साधक पहले चेतना मंत्र ‘‘ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः‘‘ का कम से कम सवा लाख जाप पूर्ण कर चुका हो।
नित्य साधना में इस महामंत्र का जाप करने के पहले कम से कम 108 बार ‘‘ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः‘‘ का जाप करें, तभी ऊर्जा शरीर में समाहित होगी।
इस महामंत्र का जाप एक सात्त्विक स्थान में बैठकर शुद्धता के वातावरण में करना चाहिये।
मानसिक जाप या चलते-फिरते समय करने पर महामंत्र का आधा फल प्राप्त होता है।
अशुद्ध व गंदे वातावरण में जाप करने का फल नहीं मिलता। अतः मंत्र जाप के समय शुद्धता का ध्यान रखना नितांत आवश्यक है।
महामंत्र का जाप मानसिक या उच्च स्वर में किया जा सकता है। मगर अशुद्ध वातावरण, स्थान व कुपात्र, धार्मिक आस्था न रखने वाले नास्तिक लोेगों के सामने उच्च स्वर में उच्चारण नहीं करना चाहिये।
पूजा स्थल में या किसी भी स्थान में मंत्र जाप करने के लिए जमीन के ऊपर कोई पवित्र आसन बिछा लेना चाहिये, अन्यथा पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण होने के कारण जप की ऊर्जा पृथ्वी खींच लेती है।
जो भी आसन बिछाकर बैठें, वह शुद्ध व साफ होना चाहिए। आसन वरीयतः लाल या पीले कपड़े का हो, या फिर जो भी उपलब्ध हो, उसका उपयोग किया जा सकता है। मगर, हिरण व सिंह आदि की छालों में बैठकर कभी भी मंत्र जाप नहीं करना चाहिए।
जब अनुष्ठान के रूप में मंत्र जाप करें, तो प्रयास करें कि जिस आसन पर बैठें, वह लाल या पीले कपड़े का ही बना हो। उसमें रुई आदि भरकर अच्छा बैठने योग्य बनवा सकते हैं। आसन में कम्बल या कुशा का भी उपयोग कर सकते है।
मंत्र जाप में यथासंभव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठने की व्यवस्था करें। ऐसा न होने पर किसी भी दिशा की ओर बैठकर मंत्र जाप किया जा सकता है।
मंत्र जाप करने वाले को सात्त्विक आहार करना चाहिये। मांस-मदिरा या अन्य घातक नशों का सेवन करने वालों को मंत्र जाप का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो सकता।
यदि मंत्र जाप अनुष्ठान के रूप में लगातार कई दिन चल रहा हो, तो ब्रह्मचर्य का पालन करना अति आवश्यक है। सामान्यता नित्य के जाप में संतुलित जीवन व अच्छे आचरण का पालन करना लाभप्रद होता है।
कुल मंत्र जाप का दशांश हवन करना अनिवार्य रहता है, जिसे नित्य भी किया जा सकता है या कुल जाप का सप्ताह में एक बार दसवां भाग हवन कर दें या माह में एक बार जैसा बन सके। इस महामंत्र के जाप का पूर्ण फल तभी मिलता है, जब जाप का दशांश हवन किया जाए। यदि हवन न किया जा सके, तो कुल जाप का 25 प्रतिशत मंत्र जाप अतिरिक्त कर लेने से हवन का फल प्राप्त हो जाता है।
बाजार में उपलब्ध या स्वयं के द्वारा तैयार हवन सामग्री से हवन किया जा सकता है।
अनुष्ठान के रूप में मंत्र जाप तभी माना जाता है, जब एक ही स्थान में अन्य कार्यों को छोड़कर अधिक से अधिक समय मंत्र जाप किया जा रहा हो।
सामान्यतया नित्य 11 बार, 21 बार, 51 बार या फिर 108 बार मंत्र जाप करें या जैसा समय हो, उतना जाप किया जा सकता है। मगर रोज कम से कम 108 बार एक स्थान पर बैठकर शुद्धता से जाप करना ज्यादा फलप्रद होता है। यदि इससे भी अधिक जाप कर लंे, तो अधिक फल प्राप्त होता है।
इस महामंत्र के जाप के अनुष्ठान पूर्ण करने के विषय में और अनेकों प्रकार की जानकारियाँ सद्गुरु के सामने उपस्थित होकर प्राप्त की जा सकती हैं, मगर कम से कम सवा लाख मंत्र जाप पूर्ण करने के बाद ही।
अनुष्ठान यदि अखण्ड ज्योति जलाकर पूर्ण किया जाय, तो ज्यादा अच्छा होता है। मगर, बिना ज्योति जलाये भी पूर्ण किया जा सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों में इस महामंत्र का कुछ न कुछ जाप नित्य करना, मनुष्य के लिए अत्यन्त लाभकारी है। जो अनुष्ठानों के रूप में जाप पूर्ण कर सकें, उन्हें प्रयास करना चाहिए व जिनके पास ज्यादा समय नहीं है, उन्हें भी रोज कुछ न कुछ मंत्र जाप कर लेना चाहिये।
इस महामंत्र के विषय में ऐसे अनेकों महत्त्वपूर्ण रहस्य हैं, जिन्हें पात्रता के अनुसार ही अवगत कराया जा सकता है। अतः जिनकी लगन इस मंत्र की पूर्णता करने की हो, वे सतत प्रयास करें और मुझसे बराबर संपर्क रखते हुए मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। उनकी पात्रता के अनुसार उन्हें मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त होगा।
ध्यान रखें, मंत्र जाप का फल पूर्ण विश्वास, भावना व पूर्ण समर्पण पर आधारित रहता है, न कि मात्र गिनती पर। यदि आपके आचार-विचार व इष्ट एवं गुरु के प्रति विश्वास से भरपूर समर्पण भावना नहीं है, तो केवल जाप करते रहने का कुछ भी फल प्राप्त नहीं किया जा सकता।
इस महामंत्र के जाप के पहले ‘‘ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः‘‘ का 108 बार जाप करना अत्यन्त आवश्यक है। सौभाग्यशाली होंगे माता जगत् जननी के वे भक्त, जो इस महामंत्र को अपने साधनात्मक जीवन में समाहित कर सकेंगे। इस महामंत्र के विषय में समय-समय पर समाज को और जानकारियां पुस्तकों के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती रहेंगी।
जय माता की - जय गुरुवर की



